A large section of farmers is rejoicing due to the withdrawal of the agriculture law, but the condition of the families of the farmers who lost their lives in the movement is pathetic. | कृषि कानून वापस होने से किसानों का बड़ा तबका खुशी मना रहा है, पर आंदोलन में जान गंवाने वाले किसानों के परिजनों की हालत दयनीय

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हरियाणाएक घंटा पहले

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बरोदा के दिवंगत किसान अजय मोर की पत्नी भावना, सेरधा के दिवंगत किसान अमरपाल की पत्नी कुसुम देवी,सिवाह के दिवंगत किसान हरेंद्र की पत्नी नीलम। - Dainik Bhaskar

बरोदा के दिवंगत किसान अजय मोर की पत्नी भावना, सेरधा के दिवंगत किसान अमरपाल की पत्नी कुसुम देवी,सिवाह के दिवंगत किसान हरेंद्र की पत्नी नीलम।

  • आंदोलनरत किसान खुश, लेकिन जिन परिवारों में कमाने वाले नहीं रहे, उनका दर्द असहनीय

कृषि कानून वापस होने से बेशक किसानों का एक बड़ा तबका बेशक खुशी मना रहा है, लेकिन आंदोलन में जान गंवाने वालों के परिजन आज भी दर्द सह रहे हैं। किसानों के जीत की खुशी मानने के लिए आज उनके बीच वे अपने नहीं रहे, जिन्होंने यह लड़ाई लड़ी। परिजनों का कहना यही कहना है कि अगर समय पर यह निर्णय लेती तो उनके अपने आज साथ होते।

  • प्रदेश के 5 परिवारों की मार्मिक कहानियां।

​​​​​​​पीएम पहले निर्णय लेते तो पिताजी की जान बच जाती

कृषि कानून वापस लेने पर पीएम का धन्यवाद करता हूं। लेकिन, यह फैसला पहले लिया होता तो पिताजी बच जाते। आंदोलन से घर लौटते समय उनकी हार्ट अटैक से जान चली गई। पिता के जाने के बाद मुझे ही खेती करनी पड़ रही है। बहन की शादी व मां की देखभाल सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। पिता आंदोलन घर पर आते थे तो कहते थे कि देखना एक दिन सरकार सभी मांगों को मानेगी। मैं अपने पिता की उस इच्छा का सम्मान करता हूं और कहता हूं कि कानून तो वापस हो गए हैं, अब एमएसपी पर फैसला सुनाना चाहिए। (जैसा समैण के दिवंगत किसान शमशेर सिंह के बेटे अमित कुमार ने बताया)

परिवार उजड़ गया, तीन नन्हीं बेटियों के भविष्य की चिंता

मेरे पति अजय मोर (32) 2 दिसंबर को कुंडली बॉर्डर पर आंदोलन में गए थे। 8 दिसंबर को उनकी मौत की खबर आई। मेरा, तीन बेटियां और मेरे सास-ससुर का सब कुछ उजड़ गया। पति ही अकेले कमाने वाले थे। परिवार के भरण-पोषण की चिंता सता रही है। खेती के अलावा आय का दूसरा साधन भी नहीं है। आंदोलन में मारे गए किसानों को शहीद का दर्जा दे परिवार के एक सदस्य को नौकरी देनी चाहिए। (जैसा बरोदा के दिवंगत किसान अजय मोर की पत्नी भावना ने बताया)

बच्चे रोज पिता को याद करते हैं, कहां से लाऊं?

25 दिसंबर की दोपहर गांव के एक व्यक्ति का फोन आया कि अमरपाल की मौत हो गई है। आंदोलन तो अब खत्म हो जाएगा। मेरी व दो बच्चों की लाइफ तो 11 माह पहले ही खत्म हो गई। 5 व 7 साल के दो बच्चे हैं। रात को नींद से जागकर पिता को पुकारते हैं। मैं उन्हें कहां से लेकर आऊं? रहने के लिए एक ही कमरा है। बच्चों को पढ़ाना भी मुश्किल हो रहा है। क्योंकि कमाई का कोई जरिया नहीं है। (जैसा सेरधा के दिवंगत किसान अमरपाल की पत्नी कुसुम देवी ने बताया)

आंदोलन ने पति छीन लिया, अब घर चलाना भी मुश्किल

पति 8 फरवरी को कुडली बॉर्डर पर जाते समय कह गए थे कि जल्द ही वापस आ रहा हूं, लेकिन उनका शव आया। दो बेटे हैं। क्या बताऊं (आंसू पोछते हुए), आज वो (पति) होते तो पता नहीं, बच्चों के लिए क्या-क्या करते। पट्‌टे पर 3-4 एकड़ जमीन लेकर खेती करते थे, तब परिवार चलता था। अब सिर्फ भैंस पाल रखी है, लेकिन उससे परिवार कैसे चलाऊं। बच्चों की पढ़ाई का खर्चा कैसे उठाऊं। (जैसा सिवाह के दिवंगत किसान हरेंद्र की पत्नी नीलम ने बताया)

घर में कमाने वाला कोई नहीं, बेटी की पढ़ाई की भी चिंता

सांपला (रोहतक) |टिकरी बॉर्डर पर जहरीला पदार्थ निगलने के कारण भाई की मौत हो गई थी। मात्र आधा एकड़ जमीन के सहारे ही खेती कर परिवार का पालन-पोषण करता था। परिवार में भाभी रेणु और 11 साल की बेटी कनिका ही है। बेटी की पढ़ाई की चिंता भी सताने लगी है। भाभी उसी दिन से सदमे में है। परिवार में कोई कमाने वाला नहीं बचा है। सरकार काे परिवार की आर्थिक मदद करनी चाहिए। घर में आजीविका का साधन नहीं है। परिवार का पालन-पोषण भी अब उन्हीं के जिम्मे है। (जैसा गांव पाकस्मा के दिवंगत जयभगवान के भाई राकेश और योगेश ने बताया।) ​​​​​​​

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